ठंडी लाश
गलती हैं कर बैठा हूँ.. तेरे भरोसे को तोड़ तुझे खो बैठा हूँ...सजा तेरी हर मंजूर है... जाना पड़े तुझसे दूर हैं ये भी मंजूर है...
गलती मेरी ऐसी नही की मैं माफी मांग सकू... भरोसा तेरा तोड़ा है अब में तेरे आगे भी ना आ सकू... दूर से तुझको देखने का हक में अब ना पा सकू...
हर वक़्त एक डर लगता है जो मैंने किया ये मेरी हकीकत का हिस्सा है...
अगर हकीकत मेरी ये ही है... तो जीना भी अब बोझ लगता है.. ज़िंदा इंसान भी अब लाश की तरह ठंडा पड़ा रहता है..
हसी है चहरे पर... उस हसी में खुशियां नही है...
गलत की मैंने.. माफी का हकदार नही हु.. तेरे से कभी ना मिलु.. इस सजा का हकदार में ही हु..
झूठ समझे तू मै ये सब दिखावा कर रहा हु.. जान बूझ के किया है मैंने... अब दिखावे का स्वांग बुन रहा हु..
गलतियां है ऐसी मेरी.. की माफी की जगह ज़िन्दगी भर की तेरी हर सजा का खुद को हकदार समझ रहा हु... अपनी नज़रो में गिर अपने आप से नफरत कर रहा हु मैं....
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